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पेड़ों को बचाने का अनोखा तरीका

पेड़ों को बचाने का अनोखा तरीका

पेड़ों को बचाने का अनोखा तरीका

सड़कें और इमारतें बनाने के लिए जिस तरह अंधाधुंध तरीके से पेड़ों की कटाई हो रही है, उससे शहर कंकरीट के जंगलों में बदल चुके हैं। अब तो बड़े शहरों में बमुश्किल ही हरियाली देखने को मिलती है। पेड़ों की कटाई के पीछे तर्क दिया जाता है कि विकास के लिए यह ज़रूरी है लेकिन पेड़ों को बचाते हुये विकास का काम कर रहे है, उदयपुर के वनस्पति वैज्ञानिक बद्रीलाल चौधरी।

पेड़ों को किया रीलोकेट

एक-दो पौधों को अपनी जगह से उखाड़कर दूसरी जगह तो शायद हर किसी ने किया होगा, मगर बद्रीलाल अब तक 10,000 हरे भरे और विशाल पेड़ों को रीलोकेट कर चुके हैं। दरअसल, सड़क बनाने के लिए अक्सर बड़े-बड़े पेड़ों को काट दिया जाता है, इसलिए बद्रीलाल ऐसे पेड़ों को वहां से दूसरी जगह स्थानांतरित कर देते हैं। अब तक वह सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारत के दूसरे शहरों के साथ ही अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में भी यह काम कर चुके हैं। वह पिछले 16 सालों से पेड़ों का स्थानांतरण करके पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं।

पेड़ों को बचाने का अनोखा तरीका
पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ  | इमेज: फाइल इमेज

पेड़ों को बचाने की ज़रूरत

एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था कि शहरों में जिस रफ्तार से पेड़ों की संख्या कम होती जा रही है उसे देखते हुए उन्हें रीलोकेट करने के दिशा में और रिसर्च किया जाना चाहिए। पीपल और बरगद जैसे पूरी तरह विकसित पेड़ों को रोड बनाते समय काट दिया जाता है और मैं सड़क किनारे उगे ऐसे पेड़ों को बचाने को लेकर बहुत चिंतित हूं। बद्रीलाल साल 2002 से पेड़ों को स्थानांतरित करने का काम कर रहे हैं।

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80 साल पुराने पेड़ को किया स्थानांतरित

बद्रीलाल ने अब तक जितने पेड़ों को स्थानांतरित किया है, उसमें सबसे पुराना गुड़गांव का 80 साल पुराना पीपल का पेड़ है। इसकी जड़े भी बहुत गहरी थी और वज़न हज़ारों टन था, मगर इसे भी सफलतापूर्वक स्थानांतरित कर दिया गया। किसी पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह लगाने में 5 हजार से लेकर 2 लाख तक का खर्च आता है। यह पेड़ की उम्र और वज़न, जड़ों की गहराई आदि बातों पर निर्भर करता है।

बद्रीलाल का कहना है कि नीम और शीशम के पेड़ों को रीलोकेट करना मुश्किल होता है क्योंकि इनकी जड़े बहुत उलझी हुई होती हैं। उनका कहना है कि किसी पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह लगाने का सबसे अच्छा समय मई-जून और फरवरी-मार्च होता है।

वैसे, पेड़ों को बचाने के लिए यदि हर कोई बद्रीनाथ जैसी ही तत्परता दिखाये, तो यकीनन हमारे आसपास से खो चुकी हरियाली दोबारा लौट आयेगी।

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