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टीनेज बच्चों के साथ कैसा हो पैरेंट्स का व्यवहार

टीनेज बच्चों के साथ कैसा हो पैरेंट्स का व्यवहार

टीनेज हर बच्चे के लिए बहुत नाजुक दौर होता है। टीनेज में प्रवेश करते समय वह एक व्यस्क और बच्चे की बीच की स्थितियों में उलझे रहते हैं यानी एक ओर जहां वह आज़ादी से अपनी ज़िंदगी जीना चाहते हैं, तो दूसरी ओर उनके अंदर अब भी बचपना होता है। ऐसे में पैरेंट्स को भी इस उम्र में बच्चों की परवरिश के तरीके में बदलाव लाने की ज़रूरत है।

बच्चों से जुड़ा हर फैसला खुद न करें

जब तक वह छोटा होता है, तो उसकी ज़िंदगी से जुड़े हर फैसले आप ही करते हैं, चाहे वह रोज़ का रूटीन हो या स्कूल का चुनाव करना। लेकिन टीनेज में पहुंचने के बाद बच्चे को कुछ फैसले खुद करने दें और अपना रोज़ का रूटीन मैनेज करने दें, क्योंकि जिम्मेदारियां निभाना वह अभी से ही सीखते हैं। यदि बच्चा कुछ काम खुद कर रहा है तो हर समय दखलअंदाज़ी न करें। इससे दो चीज़ें होंगी या तो बच्चा आप पर बहुत अधिक निर्भर हो जाएगा या वह बागी बन जाएगा। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि पैरेंट्स बच्चे को किसी चीज़ के लिए ना नहीं कह सकते, बस बच्चों को सही फैसले लेने में मदद करें।

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व्यस्क की तरह उनसे बात करें

बचपन में आप उन्हें पर्सनल हाइजीन के लिए डेली दो बार ब्रश करने और नहाने के लिए कहती थी और वह मान लेते थे, लेकिन अब उनकी उम्र बस इतनी छोटी बातों के लिए नहीं रह गई। उनसे अन्य गंभीर और ज़रूरी मुद्दों पर बात करें, लेकिन ऐसे नहीं कि वह छोटे बच्चे हैं, बल्कि उनके साथ उसी तरह बात करें जैसे आप अपने किसी कलीग के साथ करते हैं। यानी टीनेज बेटी/बेटा से रिस्पेक्ट के साथ बात करें।

मुश्किल विषय पर चर्चा

फेवरेट फूड, बड़ों की रिस्पेक्ट, विनम्र बने रहने जैसे सिंपल विषय पर अब चर्चा नहीं करनी है, बल्कि टीनेज में बच्चों के साथ कुछ गंभीर विषयों पर पैरेंट्स को चर्चा करनी चाहिए ताकि उन्हें घर से ही सही जानकारी मिल जाए।  कई ऐसे संवेदनशील मुद्दे होते हैं, जिन पर बात करना पैरेंट्स और बच्चे दोनों के लिए असहज हो सकता है, लेकिन ऐसे में माहौल को सहज बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है। बच्चों से गंभीर विषयों पर बात करते समय इस बात का ध्यान रखें कि उनकी भावनाएं आहत न हो और उन्हें सही जानकारी मिले। क्योंकि कई बार घर से जवाब न मिलने पर वह अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए बाहर भटकते हैं और हो सकता है वह चीज़ों को गलत ढंग से सीखें/समझें।

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